दमोह में ‘आचार्य भरतमुनि प्रसंग’ सम्पन्न, गायन, वादन एवं नृत्य में भारतीय संस्कृति एवं परम्पराओं के दर्शन

मध्यप्रदेश शासन, संस्कृति विभाग अंतर्गत उस्ताद अलाउद्दीन खां संगीत एवं कला अकादमी द्वारा जिला प्रशासन – दमोह के सहयोग से नाट्यशास्त्र के रचयिता आचार्य भरतमुनि की स्मृति में प्रतिष्ठित ‘आचार्य भरतमुनि प्रसंग’ का आयोजन मानस भवन, दमोह में गुरुवार की शाम को किया गया। इस अवसर पर गायन, वादन एवं नृत्य की उत्कृष्ट प्रस्तुतियों में भारतीय संस्कृति एवं परम्पराओं के दर्शन हुए।
इस अवसर पर पहली प्रस्तुति सुश्री श्वेता गुंजन जोशी, धार की गायन की रही। उन्होंने अपनी प्रस्तुति के आरंभ के लिए राग मधुवंती का चयन किया। इस मधुर और कोमल राग को श्वेता की सुरीली आवाज में सुनना श्रोताओं के लिए आनन्ददायी अनुभव रहा। उन्होंने मध्य लय त्रिताल की बंदिश जय दुर्गे भवानी माता…. के साथ राग के सौंदर्य को प्रस्तुत किया। इसके बाद राग अहीर भैरव एवं बैरागी भैरव (मिश्र राग) में महिषासुर मर्दिनी स्तोत्रम अयगिरी नंदिनी…. जिसे आदि शंकराचार्य द्वारा रचा गया, को प्रस्तुत कर दिव्य वातावरण बना दिया। श्रीरामनवमीं के पावन अवसर को ध्यान में रखते हुए श्वेता ने पायो जी मैंने राम रतन…. एवं राग भीम पलासी में हम कथा सुनाते राम सकल गुण धाम की…. के साथ गायन को विराम दिया। उनके साथ तबले पर डॉ. रवीन्द्र टांक एवं हारमोनियम पर श्री अरविंद टांक ने संगत दी।
अगली सभा वादन आधारित थी, जिसमें पंडित प्रसन्नजीत पोद्दार एवं साथी, कोलकाता द्वारा वाद्यवृंद की प्रस्तुति दी गई। इस प्रस्तुति में तबले पर श्री प्रसन्नजीत पोद्दार एवं उनके शिष्य श्री गिरुपदा दास और श्री रिद्म पोद्दार थे, वहीं मृदंगम पर श्री बिदवान पी.वी. सांईराम, श्रीखोल पर श्री चंदन चटर्जी, हैंडसॉनिक पर श्री देवब्रत घोष, हारमोनियम एवं गायन में श्री बिजॉय मंडल एवं सारंगी पर प्राणकृष्ण सांई थे। कलाकारों ने ताल वाद्य आधारित इस प्रस्तुति में तीन ताल पर वादन प्रस्तुत किया। दक्षिण एवं उत्तर भारतीय संगीत शैलियों के इस सुंदर ताने-बाने ने श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।
कार्यक्रम की अंतिम प्रस्तुति रायगढ़ घराने की सुविख्यात नृत्यांगना एवं चक्रधर नृत्य केन्द्र, भोपाल की गुरु अल्पना वाजपेयी की कथक नृत्य की रही। उनके साथ गुरु – शिष्य परम्परा के तहत उस्ताद अलाउद्दीन खां संगीत एवं कला अकादमी के चक्रधर नृत्य केन्द्र में कथक नृत्य की शिक्षा ग्रहण कर रहे शिष्यों ने भी नृत्य प्रस्तुति दी। पहली प्रस्तुति कृष्ण वंदना की रही, जिसके बोल भजे ब्रजैक नन्दनम…. थे, यह रचना पंडित बिरजू महाराज द्वारा संगीतबद्ध की गई है। इसके बाद शुद्ध कथक नृत्य के अंतर्गत तीन ताल में थाठ, आमद, मिश्र जाति परण, तोड़े-टुकड़े, गत निकास, कवित्त एवं रायगढ़ घराने की दल बादल परणों को प्रस्तुत कर तकनीकी पक्ष को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया। तीसरी प्रस्तुति तिरवट की रही, जिसके बोल थे रसराज गावत सब मिल बजावत…. थे। अगली प्रस्तुति कथक का अभिन्न अंग अभिनय में ठुमरी की थी, जिसके बोल मोहे छेड़ो नाही श्याम…. थे। यह रचना चक्रधर महाराज द्वारा रचित है, जिसे संगीत से रसिका कुलकर्णी द्वारा संवारा गया है। इन प्रस्तुतियों में अल्पना वाजयपेयी के साथ उनकी शिष्याएं सृष्टि गुप्ता, पारुल सिंह, शीतल घुगे, मृणाल तिवारी, चेतना विश्वकर्मा, शैवाली श्रीवास्तव एवं श्रेष्ठा विश्वकर्मा ने नृत्य प्रस्तुत किया।



