म.प्र. हिन्दी साहित्य सम्मेलन जिला इकाई की समीक्षा गोष्ठी संपन्न
समीक्षा गोष्ठी संपन्न

दमोह। म.प्र. हिन्दी साहित्य सम्मेलन जिला इकाई दमोह के तत्वावधान में आभा भारती के निवास पर समीक्षा गोष्ठी संपन्न हुई। “सिलसिला सांसों का“ आभा भारती की कविता संग्रह कृति पर समीक्षा कार्यक्रम अध्यक्ष सत्यमोहन वर्मा मुख्य अतिथि नरेन्द्र दुबे रहे। समारम्भ कृतिकार के कथन से हुआ, जिसमें आभा भारती ने कहा कि सर्वशक्तिमान प्रकृति के प्रतिरूप पेड़ पौधे, वृक्ष व दूब आदि से मैं कुछ बात करूं, वो कहें और मैं सुनूं इसी उद्देश्य को लेकर मैंने अपने अंतस में अनुभूत भावों को इस कविता संग्रह में आबद्ध किया है। सच्चे अर्थों में यह मेरा प्रकृति के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन है क्योंकि मानव जीवन की सांसों की जीवंतता प्रकृति से ही है। पेड़ पौधों की प्रति मैं संवेदनाओं से भरी हूं किन्तु उनको वेदना पहुंची देख में व्याकुल हो जाती हूं। समीक्षाकार रमेश तिवारी ने अपनी समीक्षा में कहा परमात्मा का प्रतिरूप प्रकृति का दृश्यमान साकार रूप पेड़ पौधे, सकल वनस्पति और इसको धारण करने वाली धरती है जो समूची मानव जाति को सांसे देती है इसी चिंतन की आधार भावभूमि पर कविता संग्रह सिलसिला सांसों का है। जिसमें नैसर्गिक यथार्थ बोध व तादात्मीकरण समाहित है। वस्तुतः संग्रह प्रकृति पर्यावरण के सकल घटक तत्वों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने का यथेष्ट उपकम है दार्शनिक भाव को पोषित करता हुआ संदेश भी है कि हम प्रकृति से हैं, हमसे प्रकृति नहीं क्योंकि उसके उपकार का सिलसिला नित्य है और हम अनित्य। वे लिखती हैं- पौधों ने ली सांस/इसी लय में मैंने मिलाई सांस/तब आई सांस में सांस/आभा जी ने प्रकृति के अवदान को संग्रह में चित्रांकित करने का सुयशी उद्यम किया है मुख्य अतिथि नरेन्द्र दुबे ने कहा आभा जी ने अपने कवित्व में पेड़ पौधों का आश्रय लेकर अपने आपको अभिव्यक्त किया है प्रकृति से निसर्ग तक की यात्रा का वर्णन उनकी कविताओं में है जो गहराई और गांभीर्य देकर सार्थकता सिद्ध करता है प्रकृति के माध्यम से जो वे अनुभव करती हैं वही कविताओं में उन्होंने उकेरा है। अध्यक्ष सत्यमोहन वर्मा जी ने कहा कि संग्रह की 133 कविताओं में आभा जी ने प्रकृति के उपादानों को लेकर मनुष्य से जोड़कर प्रकृति प्रेम के चरित्र चित्रण को कविताओं के माध्यम से अभिव्यक्ति दी है पेड़ पौधे, घास फूल एवं श्वास मनुष्य में तादात्म्य पैदा करता है क्योंकि प्रकृति में लय है। भले ही मनुष्य इस लय को न माने पर यही लय जीवन है। प्रकृति कविता का ऐसा सशक्त माध्यम है जो हमारे मन के विचारों को, भावनाओं को, गाथाओं को संक्षेप में लाकर विस्तार करता है और यही मनुष्यता का विस्तार है। इस अवसर पर डॉ. कीर्तिकाम दुबे, मनोहर काजल, पीएस परिहार, ओजेन्द्र तिवारी, राजीव अयाची, राजेश शर्मा, मानव बजाज, अनुपम भारती, अंकिता भारती की उपस्थिति रही। संतोष भारती द्वारा सबके प्रति आभार व्यक्त किया गया। अंत में देश के नामचीन व यशस्वी कहानीकार एवं पहल के संपादक आदरणीय ज्ञान रंजन जी को श्रद्धांजलि अर्पित की गई।


