श्रमण संस्कृति संस्कार शिक्षण शिविर का भव्य समापन, परीक्षा परिणाम घोषित 500 से अधिक शिविरार्थियों ने लिया भाग, 22 कक्षाएं आगे भी रहेंगी संचालित

दमोह। आचार्य श्री 108 विद्यासागर महाराज, नवाचार्य श्री 108 समयसागर महाराज एवं तीर्थ चक्रवर्ती निर्यापक श्रमण श्री 108 सुधासागर महाराज जी के मंगल आशीर्वाद से श्री दिगंबर जैन श्रमण संस्कृति संस्थान, सांगानेर तथा श्री दिगंबर जैन पंचायत एवं स्थानीय केंद्रों के तत्वावधान में आयोजित “श्रमण संस्कृति संस्कार शिक्षण शिविर” का भव्य समापन समारोह नन्हे मंदिर में संपन्न हुआ। कार्यक्रम का शुभारंभ मंगलाचरण, दीप प्रज्वलन एवं स्वागत वंदन के साथ हुआ। दीप प्रज्वलन समाज की वरिष्ठ महिलाओं द्वारा किया गया। अध्यक्षीय स्वागत भाषण श्री अरविंद इटोरया ने दिया। इस अवसर पर पुण्यार्जक डॉ. चेतन जैन, देवेंद्र भारती जैन, संयोजक शैलेन्द्र सिंघई, आशीष उस्ताज, सोनू सिंघई, प्रमोद बड़कुल, अध्यक्ष मनोज जी सहित अनेक गणमान्यजन विशेष रूप से उपस्थित रहे। शिविर निदेशक प्रतिष्ठाचार्य डॉ. प्रदीप जैन ‘आचार्य’ ने शिविर की गतिविधियों एवं भावी योजनाओं की जानकारी देते हुए कहा कि शिविर का समापन केवल एक पड़ाव है, संस्कारों की यह यात्रा निरंतर चलती रहेगी तथा विभिन्न कक्षाएं आगे भी संचालित होती रहेंगी। उन्होंने बताया कि ग्रामीण क्षेत्रों में भी बाहुबली जैन के संयोजकत्व में आगामी समय में ऐसे शिविर आयोजित किए जाएंगे। संगीत व्यवस्था एवं सांस्कृतिक संचालन में संगीतकार पीयूष जैन का विशेष योगदान रहा। प्रतिष्ठाचार्य डॉ. प्रदीप जैन के अनुसार शिविर तीन केंद्रों पर आयोजित किया गया, जिसमें 500 से अधिक शिविरार्थियों ने सहभागिता की। शिविर में 22 नियमित कक्षाएं संचालित हुईं, जिनमें संस्कार, स्वाध्याय, पूजा, संगीत, व्यक्तित्व विकास एवं जैन संस्कृति से संबंधित विविध विषयों का प्रशिक्षण दिया गया। साथ ही शताधिक शिविरार्थियों ने खेल एवं सांस्कृतिक प्रतियोगिताओं तथा विभिन्न टूर्नामेंट में उत्साहपूर्वक भाग लिया।
शिविर में महाराज श्री एवं विद्वानों द्वारा धार्मिक, दार्शनिक एवं साहित्यिक ग्रंथों का अध्ययन कराया गया। इसके अतिरिक्त नृत्य, गीत, कैलीग्राफी, अभिनय, क्राफ्ट, पेंटिंग, सिलाई, भरतनाट्यम, स्केचिंग आदि कलाओं का प्रशिक्षण भी दिया गया। ब्र. स्वतंत्र, ब्र. रोहित, अंकित, बाहुबली, मयूरी, वर्षा, प्रियंका, दीप्ति, सेजल, रिमझिम, ऋषि, अनमोल, महिमा, मानसी, प्रीति एवं दीप दीक्षा सहित अनेक शिक्षकों ने निःशुल्क सेवाएं प्रदान कीं। उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले प्रतिभागियों को समारोह में पुरस्कृत किया गया। बच्चों द्वारा प्रस्तुत स्तुति, गीत, भजन एवं सांस्कृतिक कार्यक्रमों ने सभी का मन मोह लिया। अभिनय एवं नृत्य की प्रेरणादायी प्रस्तुतियों ने मनोरंजन के साथ जीवन मूल्यों का संदेश दिया। “श्रमण संस्कृति संस्कार शिक्षण शिविर हमें सबसे प्यारा है” जैसे गीतों की संगीतमय प्रस्तुति विशेष आकर्षण रही। बालिकाओं ने स्वयं अभ्यास कर दिव्य घोष की मधुर ध्वनियों से शिविर का शुभारंभ किया तथा शिविर में सीखे गए विभिन्न वाद्ययंत्रों की प्रस्तुति देकर सभी को प्रभावित किया। समारोह में चौधरी मंदिर, सिंघई मंदिर, नन्हे मंदिर, कांच मंदिर एवं बड़ा मंदिर केंद्रों के प्रतिभागियों को परीक्षा परिणाम के आधार पर पुरस्कृत किया गया। विशेष शिक्षक सम्मान, विशिष्ट सहयोगी सम्मान एवं संस्कार गतिविधियों में उल्लेखनीय योगदान देने वाले कार्यकर्ताओं का भी सम्मान हुआ।
मूल्यांकन अधिकारी अमित जैन ने बताया कि प्रतिभागियों का मूल्यांकन 60$20$20 प्रणाली से किया गया, जिसमें परीक्षा, अनुशासन एवं पारिवारिक सहभागिता के अंक सम्मिलित थे। इस अभिनव पद्धति का उद्देश्य केवल अंक प्रदान करना नहीं, बल्कि स्थायी संस्कार परिवर्तन लाना था। भक्तामर जी की ऑनलाइन परीक्षा शिविर का विशेष आकर्षण रही। कई वरिष्ठजन तकनीकी रूप से सक्षम नहीं थे, तब उनकी बहुओं एवं बेटियों ने सहयोग कर उन्हें परीक्षा दिलवाई। इस पहल ने परिवारों में संस्कारों के साथ आत्मीयता एवं पीढ़ियों के सुंदर समन्वय का संदेश दिया। सभी मंदिर कमेटियों द्वारा स्थान, प्रबंधन एवं व्यवस्था में सराहनीय सहयोग प्रदान किया गया। सांगानेर से निःशुल्क ग्रंथ, कॉपी, पेन एवं अध्ययन सामग्री की किटें वितरित की गईं। साथ ही स्वल्पाहार एवं जल व्यवस्था भी की गई।
समारोह में सांगानेर से पधारे 7 विद्वान शिक्षकों, 12 स्थानीय शिक्षकों, 16 प्रभारियों एवं 2 टूर्नामेंट कोच का सम्मान किया गया। प्रथम, द्वितीय एवं तृतीय स्थान प्राप्त करने वाले प्रतिभागियों को पुरस्कार प्रदान किए गए। समारोह के दौरान सभी वरिष्ठजनों ने अग्नि के समक्ष स्वाध्याय, संस्कार एवं शिविर गतिविधियों को निरंतर चलाने की प्रतिज्ञा ली। अनेक श्रावकों ने अपने जीवन में आए सकारात्मक परिवर्तन साझा करते हुए भविष्य में भी ऐसे आयोजनों की निरंतरता की भावना व्यक्त की। समारोह के अंत में महाराज श्री के प्रेरणादायी प्रवचन हुए, जिनमें उन्होंने बच्चों एवं अभिभावकों को संस्कृति, संस्कार एवं स्वाध्याय से जुड़े रहने का संदेश दिया। मंगल पाठ एवं पुरस्कार वितरण के साथ कार्यक्रम का भावपूर्ण समापन हुआ।




