कहानी सच्ची है नरवाई जलाने के बजाय पथरिया के किसान ने कृषि विभाग के मार्गदर्शन में किया अनूठा प्रयोग

खेती-किसानी में जब भी गेहूं की कटाई का सीजन खत्म होता है, तो सबसे बड़ी समस्या ‘नरवाई’ (फसल के अवशेष) के प्रबंधन की होती है। ज्यादातर जगहों पर इसे जला दिया जाता है,जिससे मिट्टी के सूक्ष्म जीव तो नष्ट होते ही है जमीन की उर्वरा शक्ति भी नष्ट हो जाती है। लेकिन, इस पुरानी और नुकसानदेह परिपाटी को बदलने का एक कदम ग्राम इमलिया घोना (पथरिया) के एक जागरूक और प्रगतिशील किसान श्री नंदकिशोर पटेल ने बढ़ाया है l नंदकिशोर ने कृषि विभाग के सहयोग से अपने 2 एकड़ के खेत में नरवाई प्रबंधन का एक ऐसा प्रयोग किया है, जो क्षेत्र के अन्य किसानों के लिए प्रेरणा बन सकता है।
नंदकिशोर पटेल ने बताया कि उन्होंने यह प्रयोग अपने मन से नहीं, बल्कि वैज्ञानिक तरीके से वरिष्ठ कृषि विकास अधिकारी (पथरिया) उमाशंकर प्रजापति के कुशल मार्गदर्शन में किया है। नरवाई को आग के हवाले करने के बजाय, उन्होंने इसे खेत में ही खाद के रूप में बदलने की ठानी। सबसे पहले गेहूं की नरवाई वाले खेत की कल्टीवेटर की मदद से गहरी जुताई की गई। इसके बाद रोटावेटर चलाकर नरवाई के छोटे-छोटे टुकड़े किए गए और उन्हें पूरी तरह से मिट्टी में मिला दिया गया। इस मिश्रित मिट्टी में उन्होंने सीधे मूंग की बुवाई कर दी।
शुरुआत में थोड़ा संशय था, लेकिन मूंग की बुवाई के बाद अंकुरण पर कोई भी दुष्प्रभाव दिखाई नहीं दिया। अंकुरण बहुत शानदार रहा। सबसे अच्छी बात यह रही कि नरवाई मिट्टी में दबी होने के कारण खेत में नमी लंबे समय तक बनी रहती है, जिससे सिंचाई की जरूरत कम अंतराल पर नहीं करनी पड़ती है। शुरुआती नतीजे बेहद उत्साहजनक हैं, लेकिन नंदकिशोर का कहना है कि अभी यह देखना बाकी है कि आगामी सोयाबीन की बुवाई से पहले यह नरवाई पूरी तरह से सड़कर मिट्टी में मिल पाती है या नहीं। आमतौर पर अधसड़ी नरवाई सोयाबीन की बुवाई करते समय मशीनों (सीड्रिल) में फंसकर दिक्कत पैदा करती है।
किसान नंदकिशोर पटेल इस प्रयोग को लेकर काफी सकारात्मक हैं। उनका कहना है कि यदि कृषि विभाग के मार्गदर्शन में किया गया यह प्रयोग पूरी तरह सफल रहता है और सोयाबीन की बुवाई में कोई दिक्कत नहीं आती, तो वे भविष्य में हमेशा इसी तकनीक से नरवाई का प्रबंधन करेंगे।


