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समाज में फैली विसंगती, प्रेम प्राप्ति के संघर्ष और परिणीति को दिखाता नाटक “लछिया” राष्ट्रीय नाट्य समारोह के चतुर्थ दिवस हिंदी और बुंदेली भाषा से समाहित नाटक का हुआ मंचन कलाकारों के अभिनय के साथ कहानी और निर्देशन को मिली दर्शकों की सराहना

समाज में फैली विसंगती, प्रेम प्राप्ति के संघर्ष और परिणीति को दिखाता नाटक “लछिया” राष्ट्रीय नाट्य समारोह के चतुर्थ दिवस हिंदी और बुंदेली भाषा से समाहित नाटक का हुआ मंचन कलाकारों के अभिनय के साथ कहानी और निर्देशन को मिली दर्शकों की सराहना

समाज में फैली विसंगती, प्रेम प्राप्ति के संघर्ष और परिणीति को दिखाता नाटक “लछिया”
राष्ट्रीय नाट्य समारोह के चतुर्थ दिवस हिंदी और बुंदेली भाषा से समाहित नाटक का हुआ मंचन
कलाकारों के अभिनय के साथ कहानी और निर्देशन को मिली दर्शकों की सराहना
दमोह। संस्कृति मंत्रालय भारत सरकार के सहयोग से जिले की अग्रणी नाट्य संस्था युवा नाट्य मंच के द्वारा नगर के अस्पताल चैक स्थित मानस भवन में आयोजित किए जा रहे 21वें 5 दिवसीय नाट्य समारोह के चतुर्थ दिवस भोपाल की स्ट्रीट फैक्ट कल्चरर एंड वेलफेयर सोसायटी के कलाकारों द्वारा बुंदेली और हिंदी भाषा से समाहित नाटक लछिया का मंचन किया गया। यह नाटक समाज में जति, धर्म, वर्ग के आधार पर मानवीय स्वभाव और उनकी सोच से समाज में आने बाले प्रभाव को दिखाता है। नाटक का मुख्य पात्र मानवीय व्यवहार के उस महीन रेखा को भी दिखाता है, जिसे सामान्य मनुष्य या तो नजर अंदाज कर देता है या देखता नहीं है। कहानी का मुख्य पात्र भोला उर्फ लछिया एक ऐसे व्यक्ति की कहानी है जो ना तो पूरा पुरूष है और ना पूरी महिला। ऐसे में वह समाज से प्रेम और सम्मान पाने से तो बंचित है, लेकिन समाज के बनाए गए नियम और वाध्यताएं उसे माननी होती है। हालातों से जूझते और प्रेम और सम्मान के लिए तरसता लछिया एक दिन अपने ही बनाए एक माटी के पुतले से प्रेम करने लगता है और उस पुतले के प्रेम में वह इतना खो जाता है कि आखिरकार अपनी पहचान ही बदल लेता है। इस दौरान समाज के व्यवहार, उनकी नाराजगी और उसके मन की पीड़ा दर्शकों के मन में भी एक विचार देती है कि आखिर जिन मान्यताओं और व्यवहार को हम अपने साथ जोड़े है, वह ईश्वर ने बनाए है या हमने।

अभिनय और संगीत प्रभावी
नाटक के लेखक रंगकर्मी वसीम खान और जैकी भावसार है और निर्देशन और मुख्य पात्र की जिम्मेवारी भी इन्होने ही संभाली है। ऐसे में यह कहानी को पूर्ण रूप से दर्शकों के सामने रखने में सफल हुए है। नाटक की कहानी के साथ सबसे ज्यादा प्रभावी है पात्रों का अभिनय। मुख्य पात्र जैकी भावसार भोला से शुरू होकर लछिया के पात्र में नाटक के अंत तक खुद को लछिया में ऐसे समाहित कर लेते है कि पात्र और लछिया में अंतर नहीं रह जाता। सूत्रधार के रूप में वसीम अली, देवकी बनी कीर्ति सिन्हा, दिदिया प्रिया भदौरिया परिहार, मुंशी राजेंद्र सोनी, रागी विजय सोनवाने और अंश पायन सिन्हा, पंडित संदीप पाटिल, सविता शिवानी कटेरिया, औरतों के रूप में मोनिका राठौर अंजलि चैहान ने अपना अभिनय पूरी शिद्दत के साथ किया है। ननकू बने प्रदीप डोंगरे स्वयं, शिव व लठेत की भूमिका में शोएब अंसारी और रोहित कुशवाह और दिलीप, लठेत 2 के पात्र में देवराज जोशी ने पात्रों के साथ न्याय किया है। वहीं नाटक की मंडली में देवराज जोशी, प्रदीप डोंगरे, अंजलि चैहान, विजय सोनवाने, पात्र में रमे नजर आते है। नाटक का संगीत अत्यंत कर्णप्रिय है और पारंपरिक वाद्ययंत्रों का उपयोग संगीत के लिए किया गया है जो उसे प्रभावी बनाता है। वाद्ययंत्रों में लक्ष्मी नारायण शर्मा की ढोलक, अनिल संसारे का हारमोनियम के साथ गायन पक्ष नाटक के अनुरूप है। मंच निर्माण में असली सामग्री का ही उपयोग किया गया है और एक ही मंच पर तीन अलग अलग स्थान कुम्हार का घर, चैपाल और ठाकुर क बैठक दिखाने में निर्देशक और मंच निर्माण से जुड़े राजेन्द्र सोनी, संदीप पाटिल और मामू सफल रहे है। नाटक में प्रकाश परिकल्पना संगीत नाटक अवार्ड से नवाजे गए कमल जैन की है जो नाटक को प्रभावी बनाती है। पात्रों की वेशभूषा सीमा मोरे, मीनू तेलंग एवं शराफत अली की है।
आज लोकमाता अहिल्या की प्रस्तुति से समापन
नाट्य समारोह के पाँचवें दिवस समापन अवसर पर स्थानीय रंग समूह युवा नाट्य मंच द्वारा भारतीय इतिहास और नारी शक्ति की गौरव गाथा का प्रतीक देवी अहिल्या बाई होल्कर पर आधारित नाटक लोकमाता अहिल्या का मंचन किया जाएगा। नाटक के लेखक डाॅ उमेश चैरसिया और निर्देशक वरिष्ठ रंगकर्मी राजीव अयाची है।

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