
दमोह। सरस्वती कन्या विद्यालय के सभागार में संगीता पान्डे के मुख्यातिथ्य, कुसुम खरे श्रुति एवं डॉ प्रेमलता नीलम के विशिष्टातिथ्य तथा पुष्पा चिले की अध्यक्षता में हिन्दी लेखिका संघ की पावस गोष्ठी संपन्न हुई। यह कार्यक्रम पद्मा तिवारी के सौजन्य से आयोजित किया गया। सरस्वती वंदना एवं कार्यक्रम का सफल संचालन पद्मा तिवारी ने किया। आभार मधुलता पाराशर ने व्यक्त किया। पावस की फुहारों से सराबोर काव्य रस धारा में सभी बहनें भीगतीं रहीं। पुष्पा चिले ने कहा हरी चुनरिया ओढ़कर, धरती बांधे आस, बरसो बदरा बावरे, मिटे हृदय की प्यास। डॉ प्रेमलता नीलम ने पढ़ा आगये आषाढ़ के कजरारे बादल, झमा झम गिरता पानी तलातल। कुसुम खरे श्रुति मन बिजुरी सम दमक दामिनी, ठुमक ठुमक नयनों से यामनी। संगीता पान्डे गरजन बरसन लागे बदरवा, गुंइयां सैंया गये परदेशवा। पद्मा तिवारी हरी हरी सब डालियां हैं, पड गये हिंडोला सुन्दर। अर्चना राय पेड़ लगाना सरल है, पेड़ के साथ फोटो खिंचवाना और भी सरल है। संगीता पाराशर नीले नीले अम्बर पे काली घटा छाई है। करुणा खरे-पहली बारिश सोंधी गंध, मन खिल गया जैसे मकरंद। लता गुरू बारिश की बूंदें सावन में, उम्मीद भरे हर उपवन में। उमा नामदेव प्रकृति की गोद में नयी कोंपलें हरषाई, सुहानी पावस ऋतु आई। मधुलता पाराशर जब शहर गांव जलने लगे और झुलसने लगीं बस्तियां,तब धरा ने खिली धूप से बादलों को लिखीं पातियां। कमलेश शुक्ला आया जब वर्षा का मौसम, मन मयूर करने लगा है नर्तन। शिवकुमारी शिवहरे धरती हरी भरी रहती बरसात में, मिलती रहती बारिश सदा सौगात में। वसुन्धरा तिवारी घनघोर घटा बरसी चम चम चमक उठी दामिनी। डॉ रेवा चौधरी ऐसी वर्षा बरसे हर मन का अंधकार मिटे, भूखा न कोई सोये जग में,हर आंगन में दीप जले।


