अनाहत से अनावरण तक मूर्तियां ही सनातन का स्तंभ- श्री भगवान वेदांतरसिकाचार्य आस्था, परंपरा और सांस्कृतिक चेतना का जीवंत प्रतीक
अनाहत से अनावरण तक मूर्तियां ही सनातन का स्तंभ- श्री भगवान वेदांतरसिकाचार्य आस्था, परंपरा और सांस्कृतिक चेतना का जीवंत प्रतीक

दमोह। धर्मनगरी में आयोजित भव्य प्रतिमा अनावरण समारोह ने एक बार पुनः यह सिद्ध किया कि मूर्तियां केवल शिल्प नहीं बल्कि सनातन संस्कृति की आत्मा का साकार स्वरूप हैं। अनाहत अर्थात् हृदय की दिव्य ध्वनि से लेकर अनावरण अर्थात् प्रतिमा के प्रकट होने तक की यह यात्रा श्रद्धा, साधना और सांस्कृतिक निरंतरता का प्रतीक बनकर उभरी।यह पावन अनावरण परमपूज्य 1008 श्री भागवत दास त्यागी एवं रामायणी जी की दिव्य प्रतिमा का था, जिनका जीवन त्याग, भक्ति और रामकथा सेवा की अखंड साधना का अनुपम उदाहरण रहा है। उनकी स्मृति में स्थापित यह प्रतिमा न केवल श्रद्धा का केंद्र है, बल्कि भावी पीढ़ियों के लिए धर्मनिष्ठ जीवन का प्रेरणास्रोत भी बनेगी। इस विराट आयोजन में विख्यात संत-पुरुषों की गरिमामयी उपस्थिति विशेष आकर्षण का केंद्र रही। विष्णुसंप्रदाय प्रमुख जगतगुरु संतोषाचार्य जी महाराज मुख्य अतिथि के रूप में विराजमान रहे। समारोह की अध्यक्षता जगतगुरु नरेंद्रनंद सरस्वती ने की। आयोजन का संचालन महामंडलेश्वर अवध बिहारी दास जी महाराज के कुशल मार्गदर्शन में संपन्न हुआ। जबकि मंच संचालन श्री महंत श्रीभगवान रसिक वेदांताचार्य ने अत्यंत प्रभावपूर्ण शैली में किया। वैदिक मंत्रोच्चार, पुष्पार्चन और दीप प्रज्ज्वलन के मध्य जब प्रतिमा का अनावरण हुआ, तो वातावरण “हरि बोल” और “जय श्री राम” के उद्घोषों से गुंजायमान हो उठा। संतों एवं विद्वानों ने अपने उद्बोधनों में प्रतिपादित किया कि मूर्ति पूजन भारतीय दर्शन की वह धुरी है, जो निराकार ब्रह्म को साकार प्रतीकों के माध्यम से जन-जन तक पहुंचाती है। समारोह में भक्तश्रेष्ठ शुक्ला रानी गुप्ता (कोलकाता), रतन, रामेंद्र, दीप नारायण, पवन, शरद, डॉ. अंजनी कुमार मिश्र, विजय शंकर त्रिपाठी, मदन मोहन जी, डॉ. श्रवण दास, शिव दास, मोहन दास कोतवाल, काशी की जनता जनार्दन सहित अनेकानेक श्रद्धालु उपस्थित रहे। उनकी सहभागिता ने आयोजन को जन आस्था के महोत्सव में परिवर्तित कर दिया। अंत में प्रसाद वितरण एवं सामूहिक संकल्प के साथ यह प्रतिज्ञा ली गई कि सनातन संस्कृति के इन जीवंत प्रतीकों का संरक्षण एवं संवर्धन प्रत्येक श्रद्धालु का कर्तव्य है। प्रतिमा अनावरण का यह पावन उत्सव अनाहत नाद की भांति युगों तक श्रद्धा की ध्वनि प्रसारित करता रहेगा।

