उरुंहिता स्वरूप हैं विष्णु का प्रेम जिसमें छुपी मातृनिलया की सृष्टि : श्री भगवान यज्ञ ही दशावतारों का जनक : श्री भगवान वेदांताचार्य
श्री भगवान यज्ञ ही दशावतारों का जनक

दमोह। विशाल हृदय में धारण की हुई यज्ञ के अनंग में समाहित सृष्टि विष्णु के दशावतारों का वह कारण हैं जिसमें सनातन परंपरा गति शील हैं जो चरैवेति का सिद्धांत पोषित करती है यज्ञ केवल वैदिक कर्मकांड नहीं, अपितु सृष्टि का मूल श्वास है। वेद उद्घोष करते हैं “यज्ञो वै विष्णुः”, अर्थात् यज्ञ ही भगवान विष्णु का साक्षात् स्वरूप है। जिस प्रकार शरीर के अंगों से जीवन प्रवाहित होता है, उसी प्रकार यज्ञ के अंगों में समस्त सृष्टि स्पंदित रहती है। आहुति में अग्नि, मंत्रों में देवता, संकल्प में मनुष्य और फल में लोककल्याण निहित है। जब यह यज्ञ-चक्र संतुलित रहता है, तब प्रकृति, समाज और चेतना में सामंजस्य बना रहता है यह कथन है श्री भगवान वेदांताचार्य रसिक जी महाराज का जिनके सानिध्य मे लक्ष्मीनारायण यज्ञ और विष्णु महापुराण की कथा हो रही जिसमें वैदिक दर्शन की विवेचना में वे पुनः कहते हैं कि जब अधर्म, अहंकार और स्वार्थ इस चक्र को बाधित करते हैं, तब सृष्टि की धुरी डगमगाने लगती है। उसी क्षण करुणा के महासागर भगवान विष्णु अवतार धारण कर यज्ञरूपी व्यवस्था को पुनः स्थिर करते हैं। दशावतार इसी यज्ञ-संरक्षण की दिव्य यात्रा हैं। मत्स्य अवतार में उन्होंने प्रलय की अराजक लहरों से वेदों की रक्षा कर ज्ञान-यज्ञ को सुरक्षित किया। कूर्म अवतार बनकर समुद्र-मंथन जैसे महायज्ञ को आधार प्रदान किया। वराह अवतार द्वारा पृथ्वी को अधर्म के गर्त से निकालकर कर्मभूमि को पुनः प्रतिष्ठित किया गया। नृसिंह रूप में भक्तिरूपी यज्ञ की रक्षा हुई, जहाँ न नियम टूटे न वचन केवल धर्म की विजय हों बही वामन अवतार ने दैत्यराज बलि से दान और मर्यादा का यज्ञ कराया। परशुराम ने अत्याचार से पीड़ित पृथ्वी का शुद्धिकरण किया। श्रीराम अवतार में मर्यादा, त्याग और आदर्श शासन का यज्ञ प्रज्वलित हुआ। तो श्रीकृष्ण ने गीता के अमृत वचनों से कर्म, ज्ञान और भक्ति का महासंयोग स्थापित किया। बुद्ध अवतार में करुणा का दीप जला और अंततः कल्कि अवतार अधर्म के तमस को चीरकर धर्म के नवप्रभात का उद्घोष करेंगे। इन अवतारों का लक्ष्य भिन्न प्रतीत होता है, किंतु अंतःस्रोत एक ही सृष्टि के यज्ञ की रक्षा और जब मानव स्वार्थ में डूबकर कर्तव्य भूलता है, तब अवतार स्मरण कराते हैं कि जीवन यज्ञ है और प्रत्येक कर्म आहुति। आज के युग में भी यही संदेश प्रासंगिक है कि यज्ञ केवल अग्निकुंड तक सीमित नहीं, बल्कि सेवा, संयम, सत्य और समर्पण से युक्त जीवन पद्धति है। जब मानव अपने आचरण को यज्ञभाव से जीता है, तभी विष्णु-तत्त्व जाग्रत होता है और सृष्टि पुनः संतुलन की ओर अग्रसर होती है। श्री लक्ष्मीनारायण महायज्ञ के अंतर्गत प्रमुख यजमान सुरेश चन्द्र शुक्ल (पप्पु गुरु जी), यज्ञ आचार्य पं.आदित्य मिश्र ,एवं डॉ. डी. वी. मिश्र. सहित यज्ञ नारायण सेवा समिति के सदस्य उपस्थित रहे ।



